Ruchi Shukla

Heights of emotion................Direct Dil Se...

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दर्द की कितनी तहें

Posted On: 11 Jan, 2017 में

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minor-rape-480“गंदी बात” है ये। किसी से कहा तो नहीं…….(सन्नाटा…) ….कहना भी मत…
..अच्छा अब मेरी बात ध्यान से सुनो, किसी से कुछ भी मत बोलना। वरना सब खराब हो जाएगा। मैं हूं ना। मैं सब ठीक कर दूंगी। तुम बस किसी से बोलना मत। भूल जाओ जो हुआ। फिर नहीं होगा लेकिन आज के बाद दोबारा तुम्हारी जुबान पर वो बात नहीं आनी चाहिए जो तुमने मुझसे कही है। चुप क्यों हो, सुन रही हो ना।
नहीं…नहीं…नहीं… नहीं…रोना नहीं अब। मैं बात करूंगी ना। अच्छे बच्चे रोते नहीं। चलो अब चुप हो जाओ, शाबाश….
शाम को घूमने चलेंगे, खूब मस्ती करेंगे…तुम्हारा फेवरेट पिज्जा भी खाएंगे। बस अब बिल्कुल रोना नहीं। ओके ?…”
एक 6 साल की सहमी हुई सी सुबकती बच्ची से उसकी अपनी मां बोलती जा रही थी…पर बात क्या थी…बस उसी का जिक्र गायब था। लेकिन आप समझदार हैं, समझ गए होंगे कि बचपन की कौन सी बात पर मां चुप रहने को कह देती है। कौन सी बात झूठे रिश्तों की मर्यादा की बलि चढ़ा दी जाती है।
कौन सा दंश मासूम बचपन को तितर-बितर कर जाता है….लेकिन बचपन के दुश्मन के खिलाफ़ आवाज़ उठाना तो दूर …लोग अपने कलेजे के टुकड़ों की आह भी दबा दिया करते हैं।
कोई प्रामाणिक आकड़ा तो नहीं….लेकिन जितने भी मामले मेरी नज़र… मेरे जेहन से गुजरे उनके बिनाह पर इतना तो कह ही सकती हूं कि हर दूसरी बच्ची (और कुछ बच्चों का भी) का बचपन किसी ना किसी के वहशीपन का शिकार हो ही जाता है। अपनों की शक्ल में घूमते ये दरिंदे इतने कारसाज़ होते हैं कि इनकी करतूतों को उजागर करने कोई सामने नहीं आता।
बहुत से मासूम तो डर के मारे अपना दर्द उजागर ही नहीं कर पाते और जो कर भी पाते हैं उनके अपने ही मां- बाप उन्हें चुप करा देते हैं। क्योंकि डर तो मां-बाप को भी लगता है, ना जाने किस बात के डर से खुला छोड़ देते हैं उस वहशी को फिर नई करतूत को अंजाम देने के लिए।
जानते हैं क्यों….क्योंकि गुनहगार रिश्ते में मासूम बच्ची का चाचा, ताऊ, मामा, मौसा या भाई लगता है। कोई ऐसा जिस पर आप अंधा भरोसा करते हैं। जिसे अपने कलेजे का टुकड़ा सौंपने में आपको ज़रा भी भय यो संकोच नहीं होता। ऐसे अपनों पर अंगुली भी कैसे उठाएं….क्या बोलें….कैसे बात करें…..लोग क्या सोचेंगे….बेवजह बात बढ़ेगी…..वगैरह…वगैरह……..और फिर समाज और बदनामी का डर इंसानियत को रौंदकर निकल जाता है।
हाल ही में एक ऐसा सच सामने आया जिसे सुनते ही खून सूख गया मेरा…..एक 18-20 साल का लड़का अपने छोटे भाई से ऐसा कुछ करवा सकता है, कोई सोच भी नहीं सकता। दिमागी गंदगी की इंतेहा थी ये वारदात। नर्सरी क्लास में पढ़ने वाला वो मासूम जिसे प्यार से भइया कहता था उसी के हाथों अपने बचपन का खून होते भी देखा। कई साल गुजर चुके हैं इस बात को, वो मासूम अब बड़ा हो चुका है। आखिरकार उसने अपना सबसे बड़ा दर्द बांटने की हिम्मत जुटा ही ली और नम आंखों से दिखा दिए वो सारे घाव जो उम्र के साथ नासूर बन चुके हैं…दिल दहला देने वाला ये वाकया सुनकर कोई भी रो देता। मैं सो नहीं पाई उस रात ….आखों में तैरता रहा उसका दर्द भरा चेहरा….और साथ में उसके भाई की दरिंदगी का खयाल बार-बार मेरे दिमाग को चोट पहुंचाता रहा। भाई नहीं …किसी बहुत बड़े पाप का परिणाम था वो। मैं उस बददिमाग , बेशर्म भाई से बस इतना कहना चाहती हूं … “ तुम्हारा पाप पश्चाताप से परे है…अगर जिंदगी में सबकुछ गंवाकर भी कुछ हासिल ना कर पाओ तो अपने गुनाह को कोसना , ईश्वर को नहीं”
(उसे आज भी आज़ाद और खुशहाल घूमते देखकर कलेजा फटने लगता है, जिसने एक मासूम बच्चे का इस्तेमाल कर अपने घिनौने मंसूबों को अंजाम दिया। एक बार नहीं…कई बार…बार-बार….रिश्ते में बड़ा भाई था वो….लेकिन उसकी हवस ने छोटे भाई को ही शिकार बना लिया। और सालों तक ये बात बाहर नहीं आ पाई। जाने कैसे सहा होगा उसने किसी से कहे बगैर। सोचकर सुन्न पड़ जाता है मन। वो मासूम अब बड़ा हो चुका है पर बचपन की वो घिनौनी वारदात उसके दिलोदिमाग पर हमेशा के लिए जैसे छप चुकी है। नफरत बहुत छोटा शब्द है उस भावना के लिए जो उस बच्चे के दिल में है अपने गुनहगार के लिए। इस पाप की सज़ा ईश्वर स्वयं सुनिश्चित करेंगे)
…एक और दिल को झकझोर देने वाला वाकया मुझे याद आ रहा है….करीब 8 – 9 साल पहले की बात है, मई –जून की कड़ी दोपहर एक लड़की जिसकी उम्र 15 साल रही होगी, एक किराने की दुकान पर डिटर्जेंट पाउडर लेने गई थी, दुकानदार ने उसे बैठने को कहा और टक से एक कोल्डड्रिंक की बॉटल खोलकर उसके हाथ में थमा दी। इससे पहले कि वो कुछ समझ पाती…कुछ कह पाती….28-30 साल का दुकानदार आगे बढ़ा और दुकान का शटर नीचे गिराकर उस लड़की का हाथ पकड़ने लगा….लड़की घबराई और जोर से हाथ खींचकर शटर की ओर लपकी, दुकानदार ने फिर दबोचने की कोशिश की….लड़की ने जोर लगाकर शटर थोड़ा उठाया और साइकिल वहीं छोड़ नंगे पांव घर भागी….बदहवास हालत में मां और पिताजी के पास पहुंचते ही सारी बात जस की तस रख दी…अब उम्मीद तो थी कि दुकानदार की कुटाई होगी लेकिन ये क्या….यहां तो पिताजी और मकानमालिक ने मिलकर समझौते की योजना गढ़ डाली….एक जानबूझकर किए गए गुनाह को “गलती” का नाम देकर…बड़ी ही बेशर्मी से उस कमीने दुकानदार से माफी मंगवाई गई और छोड़ दिया गया। बचपन की छोटी-छोटी गलतियों पर बड़ी-बड़ी सज़ा का एलान करने वाले पिताजी को आज क्या हो गया था।….क्या उस वक्त भी वो किसी मज़बूरी की ओट में छुपने वाले थे….
उस वक्त भी उस दुकानदार के चेहरे पर विजय की कुटिल मुस्कान साफ नज़र आ रही थी। क्या उसके साथ वो हुआ जो होना चाहिए था। अगर थोड़ी भी देर होती तो लड़की की जिंदगी बर्बाद कर सकता था वो दुकानदार….लेकिन सज़ा के बदले हौसलाआफजाई मिली उसे। बड़े-बड़े गुनाह करके माफी मांगकर निकलने का रास्ता मिला।…ये अन्याय था….
तब मैंने सोचा….कि कहने को तो घर के मर्द मर्दानगी दिखाने का एक भी मौका नहीं चूकते लेकिन जाने क्यों अपनी मासूम बच्ची के दर्द से अक्सर समझौता कर बैठते हैं।
एक दूसरी शाम का वाकया.. .
“पापा, आपको तो सबकुछ पता है फिर भी आप इन अंकल को कुछ कहते क्यों नहीं। आपको पता है इन्होंने छोटी के साथ भी गंदा किया, ये अंकल बहुत बुरे हैं। आप इनसे बात क्यों करते हैं। इन्हें यहां से भगा क्यों नहीं देते आप, ये बहुत गंदे हैं पापा। आप तो अच्छे हैं ना। मुझे बहुत डर लगता है, प्लीज़ इन्हें हटा दो ना पापा। मैं आपकी हर बात मानूंगी, खूब पढ़ाई करूंगी, टीवी भी नहीं देखूंगी…पापा प्लीज़….मैंने मां से भी कहा था पर उसने भी अंकल को नहीं डांटा…पापा प्लीज बस इन्हें भगा दो…”
मैंने ये सारी बातें पापा की तस्वीर से कही थी। रो-रोकर….ना तो कोई सुनने वाला था और ना ही आंसू पोछने वाला। पापा कहीं दूर शहर में नौकरी करते थे। मैंने मां से सबकुछ कहा था लेकिन अंकल को कोई सज़ा नहीं मिली। वो उसी तरह घर में आते रहे और उनका वैसा ही स्वागत होता रहा। जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
फर्क बस इतना था कि जब तक वो रहते, मैं अपने ही घर में छुपकर रहती थी। उनके जाने का बेसब्री से इंतजार करती… पड़ी रहती थी कहीं कोने में मायूस। मां जानती थी मेरा हाल इसलिए कुछ कहती नहीं थी। बस खाना दे देती थी वक्त पर।
कोई तो मज़बूरी रही होगी, सोचती हूं लेकिन सोच साथ छोड़ देती है। कि ऐसी क्या मज़बूरी कि कोई आपके घर में आकर आपके ही कलेजे के टुकड़े को रौंदने की कोशिश करता है और आप चुप रहते हो। दरिंदे को सज़ा देने की बजाय उसका स्वागत करते हो। ऐसी कौन सी सामाजिक मज़बूरी है।
मैं इस मज़बूरी को कतई स्वीकार नहीं कर सकती। किसी भी हाल में नहीं। जो हो चुका है उसे बदलना मेरे वश में नहीं लेकिन मेरे बाद …मेरे सामने ऐसा कभी नहीं होगा…जो बच्चे मेरी जिम्मेदारी होंगे उनकी ओर उठने वाली हर नज़र मुझसे होकर गुजरेगी।
कोई भी रिश्ता, कोई भी लिहाज, कोई भी सामाजिक बंधन मुझे कुछ भी अनुचित सहने पर मज़बूर नहीं कर सकता। वो जो मेरे या मेरी बहनों मेरे दोस्तों या फिर मेरे नन्हे मासूम भाई के साथ हुआ वो फिर नहीं होगा। वो कितना भी अपना क्यों ना हो उसके भीतर के राक्षस को पनाह नहीं मिलेगी।
ये शपथ हम सब को लेनी होगी, चौकस रहना होगा….हरदम…हरपल….
घात लगाकर बैठे हर भेड़िये को पहचानना होगा
हर बचपन को कड़ी सुरक्षा देनी होगी
ध्यान रहे….
लापरवाही का एक भी लम्हा आपके बच्चे की मासूमियत हमेशा हमेशा के लिए छीन सकता है।
आपकी एक चुप्पी …गुनहगार को हज़ार गुनाह करने का हौसला देती है…
तो शश्श्श्श्श्श्श्श्श्श्…..करना छोड़िए…
बोलने की हर बात पर बोलिए….
पाप के विरुद्ध अर्जुन की तरह महाभारत छेड़िए….
जीत आपकी ही होगी…
क्योंकि …
कलियुग में भी कृष्ण अपने अर्जुन का ही साथ देते हैं…..

RUCHI SHUKLA

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL के द्वारा
January 16, 2017

बहुत ही कड़वा मगर सत्य पर आधारित लेख…मंथन योग्य सामाजिक गंदगी जिस पर झाड़ू लगनी अत्यंत ज़रूरी हैं !

ruchishukla के द्वारा
January 16, 2017

मेरे कई अपने इस गंदगी से का दाग मन में रखे जी रहे हैं और गंदगी फैलाने वाले आज़ाद और खुशहाल घूम रहे हैं। उनसे कोई सवाल तक नहीं पूछता कि ऐसा करने की उनकी हिम्मत कैसे हुई

Shobha के द्वारा
January 19, 2017

प्रिय रूचि आज की सबसे ज्वलंत समस्या पर प्रकास डाला है जब तक कानून ऐसे अपराधियों को सख्त सजा तुरंत सजा नहीं देगा समस्या का अंत नहीं होगा लेख पढ़ कर मन दुखी हो गया

ruchishukla के द्वारा
January 22, 2017

जी शोभा जी…. मैं भी यही चाहती हूं…सज़ा मिलनी ही चाहिए…वरना अपराधियों का हौसला बढ़ता है


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